Pachauri Guruji is a vedic astrologer and a spiritual leader

अभ्यास---

भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, कीर्तन
                   मनन तथा श्वास के द्वारा जप और भगवत्प्राप्ति
                   बिषयक शास्त्रों का पठन-पाठन इत्यादिक चेष्टा
                   भगवत्प्राप्ति के लिए बारंबार करने का नाम
                   “अभ्यास”है।             

"परायण"---

स्वस्वार्थ को त्याग कर तथा परमेश्वर को ही
परम आश्रय और परमगति समझकर, निष्काम प्रेमभाव से सती-शिरोमणि, पतिव्रता स्त्री की भाँति मन,वाणी और शरीर
द्वारा परमेश्वर के लिए यज्ञ,दान और तपादि सम्पूर्ण कर्तव्य-
कर्मों के करने का नाम अर्थात् भगवदर्थ कर्म करने का नाम
“परायण” है।

"अनादि"---

अनादि उसको कहते हैं कि जो आदिरहित हो, एवं सबका कारण हो। इसलिए परमात्मा श्रीकृष्ण “अनादि ” हैं।

 

गौओं की महिमा कौन भला बतलाये?
जिनके गुण-गौरव वेदों ने भी गाये।।
जिनकी सेवा के हेतु व्रह्म अवतार पाये।
भगवान स्वयं मानव बनकर गाय हैं चराये।।

 

गाय में ब्रह्माण्ड

गाय के दोनों सींगों की जड़ में श्री ब्रह्माजी एवं श्रीविष्णुजी
सींगों के अग्रभाग में समस्त तीर्थों का वास है। ललाट में शिवजी तथा ललाट के अग्रभाग में महादेवी पार्वतीजी स्थित
हैं।नासिका में कार्तिकेय जी तथा दोनों कानों में अश्विनी कुमार
स्थित हैं।दोनों नेत्रों में सूर्य एवं चन्द्रदेव,दाँतों में वायु देव तथा
जीभ में वरुण देव तथा हुँकार में श्री सरस्वती जी का वास है।
गाय की दोनों कनपटियों(कान के नीचे) यमराज और धर्मराज
तथा दोनों ओठों में प्रातः और सन्ध्या एवं गर्दन में इन्द्रदेव का
वास है। पेट के ऊपरी भाग में राक्षसगण व छाती में साध्यदेव
तथा चारों पैरों में धर्म, अर्थ,काम और मोक्ष स्थित हैं। खुरों के
मध्य भाग में समस्त गन्धर्व तथा खुरों के अग्रभाग में समस्त नागदेवता तथा खुरों के पार्श्वभाग में समस्त अप्सरायें विराजमान हैं। पीठ में एकादश रुद्र तथा सन्धियों (जोड़ों)में
अष्टवसु निवास करते हैं। पीठ के पिछले भाग में पितरदेव एवं
पूँछ में चन्द्रदेव का वास है। पूँछ के बालों में सूर्य की किरणें व
गोमूत्र में गंगाजी तथा दूध सरस्वती जी तथा दही में नर्मदाजी
वास है। घी में अग्निदेव एवं रोमावली में एक अंश से तेतीसकोटि देवता निवास करते हैं। उदर में पृथ्वीदेवी थनो में
सागर तथा चारों पैरों में चारों वेदों का वास है। अर्थात् समस्त
तीर्थ,नदियाँ, सागर,ऋषि तथा इन्द्रादि सहित समस्त देवगण व
समस्त पितर तथा सूर्यादि समस्त ग्रह एवं गोबर में लक्ष्मी देवी
गाय में ही एक अंश से निवास करते हैं।

 
 

भूखी रहकर दूध पिलाने वाली गौएं।
बिष पीकर अमृत पिलाने वाली गौएं। ।
मिट रहीं हमारी ही आँखों के आगे।
मरकर भी हमें जिलाने वाली गौएं। ।

 

गाय पंच-गव्य से पाप शमन करती है
गाय पञ्चामृत से ताप शमन करती है।।
गाय रोम-रोम से निरन्तर उपकार करती है।
गाय जीवन का सब अभिशाप शमन करती है।।

 

 

एकमप्यक्षरं यस्तु गुरुः शिष्ये निवेदयेत।
पृथिव्यां नास्ति तद्र्व्यं यद्दत्वा ह्यनृणी भवेत्।।
एकाक्षरप्रदातारं यो गुरुं नाभिमन्यते।
श्वानं योनिशतं गत्वा चाण्डालेष्वभिजायत।। अत्रिस्मृतिः।।
              यदि गुरु ने अपने किसी भी शिष्य को एक अक्षर का भी ज्ञान दिया है। तो फिर इस धरा पर ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे देकर शिष्य गुरु ॠण से मुक्त हो सके।।
              जिस शिष्य ने गुरु से एक अक्षर का भी ज्ञान लिया है। वह शिष्य यदि अपने गुरुजी का हृदय से सम्मान नहीं करता,तो ऐसा शिष्य सौ जन्म तक कुत्ता योनि भोगकर अन्त में चाण्डाल बनता है।।

 
 

तू भिक्षु अकिञ्चन दाता तेरी गौएं।
तू शरणागत है  त्राता तेरी गौएं। ।
कर गौओं का मत रक्त पान रे पामर!
तू  पुत्र  और  ये  माता  तेरी  गौएं। ।

 

 

हाय!पौरुष भी भरपूर न हमसे होता।
अत्याचारी   मजबूर  न  हमसे होता।।
हम  कायर  या निर्जीव  कहें  अपने को।
माता का भी दुख दूर न हमसे होता। ।

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विधि की विविधता में विविध विधी से विविध रंगों में रंग जाना
विधि का विधान है। इन्हीं जीवन की विविधताओं में विधि-
पूर्वक विधि के विधान का आओ आज वृहद और विरल दर्श
करें। चलो आज रंगों की दुनियाँ में हम भी रंगीन हो जायें, तो
क्या हर्ज़ है। पावन-पवित्र आने वाली रंगीन शाम आपका जीवन रंगीन करदे।। रंग-रंगीली-गीली-गीली सुन्दर भोर,
।। चहुँओर करत हुरियारे गली में शोर।।

 आपका अपना—-
                                  ज्यो0—-‘पचौरी गुरुजी’
                                         विशाल कृष्ण

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